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Friday, 24 February 2017

परिशिष्ट लेखन की शैलियां

परिशिष्ट लेखन की शैलियां



परिशिष्ट


परिशिष्ट के लिए अंग्रेजी में “Suppliment” शब्द का प्रयोग किया गया है | “Suppliment” का अंग्रेजी अर्थ है ‘Something
added to complete a thing, or extend or strengthen the whole’ अर्थात ‘कुछ भी ऐसा जिसके जुड़ाव से कोई भी चीज़ पूरी हो या उसे बल मिले’ | समाचार पत्र के लिए परिशिष्ट भी यही कार्य करता है | परिशिष्ट समाचार पत्र की लोकप्रियता बढाता है और उसके प्रसार-प्रचार में वृद्धि करता है |
    
विभिन्न समाचार पत्र पाठकों के मनोरंजन, सूचना और समसामयिक मुद्दों पर विश्लेषण हेतु अलग-अलग विषयों पर परिशिष्ट प्रकाशित करते है | परिशिष्ट प्रकाशन का मुख्य उद्देश्य अपने समाचार पत्र का प्रसार संख्या बढ़ाना और उसे लोकप्रिय बनाना होता है | इसलिए परिशिष्ट में रुचिकर और मनोरंजक सामग्री प्रकाशित की जाती है |

परिशिष्ट का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, इसकी शुरुआत नब्बे के दशक में राष्ट्रीय सहारा ने की थी | तब परिशिष्ट साप्ताहिक प्रकाशित होती थी  | धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता बढ़ती गयी और इसे हफ़्ते में तीन से चार दिन प्रकाशित किया जाने लगा | आज परिशिष्ट समाचार पत्र का एक अभिन्न अंग बन गया है | यह इतना महत्वपूर्ण हो चुका है कि समाचार पत्र प्रतिदिन परिशिष्ट का प्रकाशन करते है |   

समाचार पत्रों का मुख्य प्रयास यह रहता है कि परिशिष्ट में प्रकाशित सामग्री विश्वसनीय हो और साथ ही उसकी शैली आकर्षक हो, जिससे पाठक इसे चाव से
पढ़े, समझे और अपनी जानकारी को बढ़ा पायें | परिशिष्ट गंभीर लेखों की तरह बोझिल और नीरस नहीं होते | सरल भाषा और रोचक शैली में लिखें गए परिशिष्ट पाठक को अपने में बांध लेते है |

परिशिष्ट अलग-अलग विषयों पर पूरे विस्तार से जानकारी देता है जैसे स्वास्थ्य से सम्बंधित विषय , मनोरंजन, पर्यावरण आदि | परिशिष्ट में अलग-अलग प्रकार की शैलियाँ विषयानुसार चयनित की जाती है | पाठक को परिशिष्ट के माध्यम से किसी भी विषय की पूरी जानकारी सिलसिलेवार ढंग से मिलती है |
लेखक परिशिष्ट के माध्यम से किसी प्रश्न, समस्या या सन्दर्भ विशेष पर अपने विचारों को पाठक वर्ग तक पहुँचा सकता है | कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि, किसी महत्वपूर्ण तिथि, व्यक्ति की जन्म तिथि, त्यौहार, कला साहित्य, पर्यटन और पर्यावरण संबंधित विभिन्न प्रकार की शैलियों को इस्तमाल कर इन्हें आकर्षक बनाया जाता है |

परिशिष्ट का मुख्य उद्देश समाचार पत्र के प्रसार को बढ़ाना होता है इसलिए ज़रूरी है कि परिशिष्ट की भाषा रोचक एवं मनोरंजक हो जिसे किसी भी वर्ग के लोग पढ़ सके | समाचार पत्र से भिन्न परिशिष्ट में बच्चों, स्त्रियों, युवाओं के रूचि अनुसार लेख प्रकाशित होते है | परिशिष्ट में पाठकों से प्राप्त सामग्री को भी प्रकाशित किया जाता है ताकि पाठक इससे अपना प्रत्यक्ष जुड़ाव महसूस कर सके और समाचार का प्रसार बढ़े |      

परिशिष्ट के उदहारण

समाचार पत्र
शिक्षा और रोजगार
पर्यटन
महिला  संबंधित
विश्लेष्णात्मक
बालोपयोगी
मनोरंजन
दैनिक जागरण
जोश
यात्रा
झरोखा
मुद्दा
जूनियर जागरण
ग्लैमर दुनिया
दैनिक भास्कर



अभिवयक्ति
जूनियर भास्कर
मधुरिमा
राष्ट्रीय सहारा


आधी दुनिया
हस्तक्षेप


अमर उजाला
उडान, कैंपस

रूपायन


रंगायन
हिन्दुस्तान
नई दिशाएं

हेल्थ

नंदन
अनोखी
जनसत्ता

रविवारीय

रविवारीय


नवभारत टाइम्स
एजुकेशन

डेल्ही टाइम्स


डेल्ही टाइम्स
नवोदय टाइम्स


मनोरंजन एवं नारी


मनोरंजन एवं नारी
पंजाब केशरी
एजुकेशन करियर




मनोरंजन



परिशिष्ट लेखन की शैलियां


विवरणात्मक शैली

विवरणात्मक शैली में विषय की व्याख्या की जाती है | इसमें पाठको को किसी भी विषय की विस्तृत रूप से जानकारी दी जाती है | इस शैली के अंतर्गत शिक्षा और रोजगार, पर्यटन, पर्यावरण, स्वास्थ्य आदि सम्बन्धी विषयों पर पूरी जानकारी दी जाती है |

विवरणात्मक परिशिष्ट में यात्रा वृतांत, शिक्षा, रोज़गार, पर्यटन, खान-पान, स्वास्थ्य, आदि संबंधित लेख प्रकाशित होते है | परिशिष्ट में इस शैली का प्रयोग कर पाठक को किसी भी विषय की पूर्ण एवं विस्तृत जानकारी दी जाती है | इसमें विषय के सकारात्मक पक्ष के साथ नकारात्मक पक्ष को भी पाठकों के समक्ष लाया जाता है | इसे पढ़कर पाठकों को विषय से संबंधित अपने सारे सवालों के जवाब मिल जाते है |
उदाहरण के तौर पर यात्रा – दैनिक जागरण, जोश – दैनिक जागरण, नई दिशाएं – हिन्दुस्तान, कैंपस – अमर उजाला, एजुकेशन – नव भारत टाइम्स, आदि प्रमुख विवरणात्मक परिशिष्ट है |    


भावनात्मक शैली

जैसा की इस शैली के नाम से ही ज्ञात होता है कि जिस विषय में भाव हो और जो पाठकों के ह्रदय को स्पर्श करे | भावनात्मक शैली मानव संवेदना से जुड़ा होता है | भावनात्मक शैली मार्मिकता प्रधान होती है | इस शैली का प्रयोग मुख्यतः फीचर में किया जाता है तथा इसके अलावा कभी-कभी इसका प्रयोग यात्रा-वृतांत और रिपोर्ताज में भी किया जाता है |

भावनात्मक शैली मानसिक अंतर्द्वंदो और आत्म-विश्लेषण से युक्त होती है | इस शैली में विभिन्न भाव जैसे सुख, दुख, प्रेम, करुणा, क्रोध, आदि का समावेश होता है |
भावनात्मक परिशिष्ट में ऐसे लेख प्रकाशित होते है जो मानव भावनाओं पर केन्द्रित होते है जैसे प्रेम-प्रसंग, सांस्कृतिक, विशेष उपलब्धियां, सामाजिक आदि |

विश्लेषणात्मक शैली

इस शैली में किसी भी तत्कालीन घटना या विषय का विश्लेषण कर पाठकों को उस विषय के बारे में विस्तृत ब्यौरा दिया जाता है | इसके माध्यम से लेखक अपनी राय को लोगों की राय बनता है | विश्लेषणात्मक शैली में सबसे महत्वपूर्ण कार्य है विषय का चयन एवं विषय पर शोध-कार्य | शोध जितना गहन हो, लेख उतना ही अधिक प्रभावशाली होता है |

विश्लेष्णात्मक परिशिष्ट में किसी एक विषय पर पूरे शोध कार्य के साथ विषय की कलात्मक एवं रोचक परिशिष्ट तैयार किया जाता है जो उस विषय से संबंधित पाठक के सभी प्रश्नों का उत्तर उन्हें देने का प्रयास करता है | जो मुद्दे समाचार पत्र में प्रकाशित नहीं हो पाते परन्तु महतवपूर्ण होते है तो ऐसे मुद्दों को पूरे विश्लेषण के साथ समाचार पत्र के परिशिष्ट में प्रकाशित किया जाता है | सामाजिक चिंतन से पूर्ण ऐसे परिशिष्ट पाठको के ज्ञान में वृद्धि के साथ साथ उसे सामाजिक विषयों पर चिंतन के लिए बाध्य करती है |

विश्लेषणात्मक परिशिष्ट में प्रमुख रूप से हस्तक्षेप – राष्ट्रीय सहारा, मुद्दा – दैनिक जागरण, अभिवयक्ति – दैनिक भास्कर आदि प्रकाशित होते है जिनमे सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, आदि मुद्दों का पूरा विश्लेषण किया जाता है |   


व्यंगात्मक शैली

व्यंगात्मक शैली व्यंग (ताना) आधारित शैली होती है | समाज में जहाँ विसंगति, विषमता या विडम्बनापूर्ण स्थिति होती है वहां विवरण सीधे-सीधे नहीं बल्कि व्यंगात्मक ढंग से दिया जाता है | जहा विवरण करने में व्यंग का प्रयोग होता है, उसे व्यंगात्मक शैली कहते है | इस शैली में मुहावरों व लोकोक्तियों का प्रयोग कर व्यंग किया जाता है |

व्यंग्यात्मक परिशिष्ट में मुख्य रूप से राजनैतिक मामलों पर केंद्रित होता है | इसमें सरकार की रणनीति, कामकाज, योजनाएं आदि पर व्यंग्यात्मक तरीके से आलोचना की जाती है| व्यंग्यात्मक शैली में लिखने के लिए भाषा और साहित्य का व्यापक ज्ञान और समझ होनी चाहिए | शब्दों का दोहराव भी ज्यादा नहीं चाहिए  वरना इस शैली में लिखे गए लेख नीरस लगेगे |  हस्तक्षेप – राष्ट्रीय सहारा, मुद्दा – दैनिक जागरण, अभिव्यक्ति – दैनिक भास्कर कुछ प्रमुख परिशिष्ट है जो व्यंग्यात्मक तरीके से सरकार असफलता और नीतियों पर कटाक्ष करते है |  



चित्रात्मक शैली

चित्रात्मक शैली में लेखक अपने शब्दों और रचनात्मकता से पाठक के मन-मस्तिष्क में चित्रों का निर्माण करते है और पाठक वर्ग उस प्रसंग को जीने लगता है और उस विषय से जुड़ जाता है | जहाँ कम से कम शब्दों में किसी व्यक्ति और वस्तु आदि का वर्णन किया जाता है उसे चित्रात्मक शैली कहते है|

इस शैली को पत्रकार द्वारा पाठक वर्ग को सूचित एवं मनोरंजित करने के लिए ज्यादा प्रयोग किया जाता है | चित्रात्मक शैली बिना किसी साधन के केवल अक्षरों और शब्दों द्वारा हमें चित्रों और दृश्यों का सुख देती है | 
  
यात्रा वृतांत या संस्मरण आदि में भी चित्रात्मक शैली का प्रयोग होता है | इस शैली का प्रयोग दो रूपों में किया जाता है – पहला दृश्यों और वस्तुओं का चित्रांकन कर उन्हें सजीव रूप प्रदान करने के लिए और दूसरा पात्र के रूप एवं सौंदर्य को दिखाने के लिए | 
चित्रात्मक शैली तभी सफल है जब पाठक अपने मन मस्तिष्क में दृश्य निर्माण कर सके | 


Wednesday, 22 February 2017

टेलीविज़न उद्योग का विवेचन

टेलीविज़न उद्योग का विवेचन

अनुक्रमणिका

  • मीडिया और मनोरंजन
  • टीवी और मनोरंजन का अंतरसंबंध
  •  टेलीविज़न उद्योग
  •  निष्कर्ष


 मीडिया और मनोरंजन

मानस और रंजन, संस्कृत के इन शब्दों से बने मनोरंजन शब्द का अर्थ है, मन की प्रसन्नता |  मनुष्य सवभाव से ही मनोरंजन प्रिय होता है | मनोरंजन का इतिहास बहुत पुराना है | उसका संबंध मनुष्य सभ्यता से जुड़ा हुआ है | मनोरंजन एक ऐसी क्रिया है जिसमे सम्मिलित होने वाले को मन की शांति मिलती है और आनंद आता है | जो उद्योग मनोरंजन प्रदान करता है उसे मनोरंजन उद्योग कहते है |

पिछले 15 वर्षों में मीडिया के स्वरुप में बहुत तेज़ बदलाव देखने को मिला है | सूचना क्रांती एवं तकनीकी विस्तार के चलते मीडिया की पहुँच व्यापक हुई है | इसके सामानांतर भूमंडलीकरण, उदारीकरण एवं बाजारीकरण की प्रक्रिया भी तेज़ हुई है, जिससे मीडिया अछूता नहीं है | नए-नए चैनल खुल रहे हैं, नए-नए अखबार एवं पत्रिकाएं निकाली जा रही है और उनके स्थानीय एवं भाषायी संस्करणों में भी विस्तार हो रहा है | मीडिया के इस विस्तार के साथ चिंतनीय पहलू यह जुड़ा है कि मीडिया अब सामजिक सरोकारों से दूर होता जा रहा है | मीडिया की प्राथमिकताओं में अब शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, विस्थापन जैसे मुद्दे रह ही नहीं गए हैं | उत्पादक, उत्पाद और उपभोक्ता के इस दौर में ख़बरों को भी उत्पाद बना दिया गया है, यानी जो बिक सकेगा, वही खबर है |  मीडिया के इस बदले रुख से उन पत्रकारों की चिंता बढ़ती जा रही है, जो यह मानते हैं कि मीडिया के मूल में सामजिक सरोकार होना चाहिए |

अख़बारों और टेलीविज़न समेत सभी संचार माध्यम एक तरह से प्रोडक्ट बन गए है | सभी को अपने सामान को बाज़ार में बेचना है और इसलिए यहाँ एक ऐसी प्रयोगशाला बना दी गई है जो 24 घंटे प्रयोग करती है | नया संस्करण लाने, नई तकनीक को अपनाने और फीडबैक के मुताबिक खुद को नए सांचे में ढालने में इसे को आपत्ति नहीं है |


टीवी और मनोरंजन का अंतरसंबंध

1959 से लेकर 90 की शुरुआत तक दूरदर्शन के नाम पर काफी हद तक सभ्य लेकिन सूखे मनोरंजन का ही राज रहा | दूरदर्शन मुख्य रूप से किसानों और साक्षरता की बात के आस-पास ही घूमता रहा | मनोरंजन के नाम पर हफ्ते में एक बार फिल्म और चित्रहार ही था | बस इसी में पेट भर लेना होता था |
उदारवाद की लहर में जब निजी चैनलों का प्रसारण आरम्भ हुआ तो टेलीविज़न का तो मानो जैसे परिभाषा ही बदल गई | फिर तो यहाँ कभी नागिन के डांस ने सबको नचाया, कभी प्रलय ने डराया तो कभी कपिल शर्मा ने हंसाया | पहली बार भारतीय टीवी पर ही यह प्रयोग हुआ कि न्यूज़ चैनलों के बीच में हसगुल्ले यानी कि हास्य परोसा जाने लगा | राजू श्रीवास्तव सरीखे एकाएक न्यूज़ चैनलों के आँखों के तारे बन चले |

फिल्म निर्माता और कलाकार भी जिस छोटे परदे को जिस पिछड़ी जाति जैसा माना करते थे, अब इसकी आरती उतारने लगे | फिल्मों के प्रमोशन के लिए ‘बंटी और बब्ली’ के रिलीज़ होते ही रानी मुख़र्जी और अभिषेक बच्चन NDTV की न्यूज़ तक पढ़ जातें है | आज टीवी को फिल्म से अलग नहीं माना जा सकता  | दोनों एक दुसरे में कब घुल गए किसी को पता ही नहीं चला |
यह टीवी का ही प्रभाव है कि करीब डेढ़ सौ साल पुराना सिनेमा अपनी बुनियादी सामाजिक जिम्मेदारी को ठेंगा दिखाते हुए फूहड़, बे-सिरपैर की कहानियों पर थोक में फिल्में बनाता जा रहा है | उद्योग की हैसियत से मनोरंजन अब मोटी कमाई का स्रोत बन गया है | अब हर तरह की कहानी केवल मज़ा लेने के लिए ही बनती, बनाई जाती हैं |

उदारीकरण के बाद पश्चिम के तरफ़ से खिडकियाँ खुल गयी है, भारतीय दर्शको की सोच का दायारा भी विस्तृत हो गया है | वह लंबी उड़ान भरना चाहता है और बोरियत से बाहर आने को आतुर है | सालों तक मीडिया में राजनीति हावी रही, अकेली राजनीति ना तो अब दर्शको को लुभाती और ना ही बहुत सम्मानित ही लगती है | वह प्रयोगधर्मी होना चाहता है और ऐसे कार्यक्रम चाहता है जो बोरियत को दूर करे और जीवन में रंग भरे, उसे नए विकल्प सुझाये और उसका साथी बने | इसलिए अब टीवी को अपना मेन्यु बदलना पड़ा है | उसे कोने कोने में बनने वाले नए पकवान और स्वाद इनमे शामिल करना पड़ रहा है, और यह भी कोशिश करनी पड़ रही है कि इन प्रयोगों का खर्च कहीं और से आये | यही वजह है कि भारत में न्यूज़ और मनोरंजन उद्योग इस समय अपने उफान पर है | मनोरंजन अब न्यूज़ मीडिया में रचता-बस्ता जा रहा है | अब न्यूज़ चैनल को देखते हुए कई बार उसमे से खबर को ढूँढना तक मुश्किल हो जाता है | बालीवुडाईजेशन ने न्यूज़ मीडिया को एक नए मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है |   
टीवी पर विवाद को भी मनोरंजन का रूप दे दिया गया है | भारत-पाकिस्तान के विवादस्पद मुद्दे को भी दर्शको को मनोरंजन के रूप में परोसा जाता है | टीवी के लिए कटरीना कैफ के जन्मदिन पर शाहरुख-सलमान की लड़ाई भी एक हफ्ते के लिए खबर बन जाती है और इसे ब्रेकिंग न्यूज़ के दर्जे में डाला जाता है | मनोरंजन ऐसा कि जब कोई पत्रकार पी चिदंबरम पर जूता फेकता है तो उस दिन जूता और वो पत्रकार दोनों सेलेब्रिटी बन जाते है |
     
बेशक खबर अब ठिठोली करने लगी है | बरसो पहले टी.एस इलियट ने जब कहा था कि ‘ टीवी का काम मूलतः मनोरंजन परोसना ही होना चाहिए’ तो किसी को यह बात समझ में नहीं आई थी, लेकिन अब ऐसा ही है | टीवी के पहले चैनल से लेकर आखिरी चैनल तक मनोरंजन के नाम पर अब सपने बेचे जा रहे हैं | अब सवाल यह उठता है कि खबर दिखायेगा कौन ? उसे देखेगा कौन ? और असल में खबर होगी क्या ?  


टी.वी उद्योग

टेलीविज़न उद्योग मनोरंजन का अत्याधुनिक साधन है | टीवी ने मनोरंजन की दुनिया में एक नए युग का शुरुआत कर दी है | आज मनोरंजन उद्योग पर सबसे ज्यादा टेलीविज़न का दबदबा है |

अगर हम टीवी उद्योग की बात करे तो प्रसारण मंत्रालय की 2008-09 की रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल 394 पंजीकृत टीवी चैनल्स है जिनमे 211 चैनल समाचार के है | टीवी का प्रवेश निजी क्षेत्र में 2000 में हुआ था लेकिन 9 वर्षो में ही इसने विशाल रूप धारण कर लिया और राष्ट्रीय जीवन में एक अहम भूमिका अख्तियार कर ली है |
आज भारत, चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा टीवी बाजार है | आज टीवी देश के 10.8 करोड़ घरो तक पहुच चूका है और 6.8 करोड़ घरो में केबल और सेटलाइट टीवी पहुच चूका है | इसके बावजूद टीवी के पहुच देश के 60% घरो से कम ही है और केबल और सेटलाइट टीवी की पहुच तो देश के कुल घरों के एक चौथाई से भी कम है | इसका सीधा-सीधा अर्थ यह है कि अभी देश में टीवी के विस्तार की व्यापक संभावनाए मौजूद है |

इतने सीमित विस्तार के बावजूद टीवी उद्योग आज देश का सबसे बड़ा मीडिया उद्योग है | 2005 में उसका कुल राजस्व 18500 करोड़ रुपये का था जो मीडिया उद्योग में उसके निकटतम प्रतिद्वंदी प्रिंट मीडिया के कुल राजस्व से दुगना था | सिर्फ डेढ़-दो दशकों में टीवी उद्योग का विज्ञापन राजस्व 1991 के 390 करोड़ से उछलकर 2005 में 6846 करोड़ पर पहुँच गया है | आज देश में 160 से अधिक टीवी चैनल विभिन्न भाषाओँ और प्रकारों में टीवी दर्शकों तक पहुँच रहे है | कोई 35-40 हजार केबल वालें और आधा दर्ज़न एमएसओ के साथ-साथ सार्वजनिक प्रसारक दूरदर्शन और कोई एक दर्जन बड़े देशी-विदेशी प्रसारणकर्ता इस बाज़ार में शामिल हैं |
भारतीय निवेश सलाहकार और क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगले तीन वर्षो में मीडिया मनोरंजन उद्योग के कुल विज्ञापन के आय का 40% टीवी के हिस्से में चला जाएगा | इसके कारण अगले तीन वर्षो में 100 और टीवी चैनल शुरू हो सकते है | मौजूदा समय में कुल 350 ब्रोडकास्टर हैं जो कुल 780 चैनेलो को संचालित करते है |
  
भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग 2005
मीडिया राजस्व (अरब रुपये)
टीवी – 185
प्रिंट मीडिया - 25
फिल्म - 72
रेडियो - 3.6 

भारत के कुछ प्रमुख टीवी प्रसारणकर्ता
कंपनी का कुल राजस्व 2004-05 में (करोड़ रुपये में)
जी टेलीफिल्म्स – 1360
स्टार इंडिया – 1300
सोनी एंटरटेनमेंट – 1000
दूरदर्शन – 664
सन टीवी – 300 

निष्कर्ष
आज मनोरंजन उद्योग पर सबसे ज्यादा टेलीविज़न का दबदबा है | टेलीविज़न उद्योग मनोरंजन का अत्याधुनिक साधन है | टीवी ने मनोरंजन की दुनिया में एक नए युग का शुरुआत कर दी है |

टीवी का प्रवेश निजी क्षेत्र में 2000 में हुआ था लेकिन 9 वर्षो में ही इसने विशाल रूप धारण कर लिया | प्रसारण मंत्रालय की 2008-09 की रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल 394 पंजीकृत टीवी चैनल्स है जिनमे 211 चैनल समाचार के है | मौजूदा समय में कुल 350 ब्रोडकास्टर हैं जो कुल 780 चैनेलो को संचालित करते है | अगले तीन वर्षो में 100 और टीवी चैनल शुरू हो सकते है | टीवी के पहुच देश के 60% घरो से कम ही है और केबल और सेटलाइट टीवी की पहुच तो देश के कुल घरों के एक चौथाई से भी कम है | इसके बावजूद 2005 में उसका कुल राजस्व 18500 करोड़ रुपये का था जो मीडिया उद्योग में उसके निकटतम प्रतिद्वंदी प्रिंट मीडिया के कुल राजस्व से दुगना था | सिर्फ डेढ़-दो दशकों में टीवी उद्योग का विज्ञापन राजस्व 1991 के 390 करोड़ से उछलकर 2005 में 6846 करोड़ पर पहुँच गया है |